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कहानी-दुख की दहलीज पर


दुख की दहलीज पर

नीतू मुकुल

वह टहलती हुई पेड़ पौधों की सुरंग नुमा गलियों से होकर गुजरी, तो उसे एहसास हुआ, जो हो चुका है उसे रोका नहीं जा सकता था। बागीचों की काली गीली दलदली मिट्टी के रास्तों से होते हुए वो, तालाब किनारे जा पहुंची। सूरज की एक किरण मकड़ी के जालों भरी शहतीर से तिरछी आ रही थी, जो सीधे पहले सीढिय़ों पर बैठी युवती पर पड़ रही थी। उसने आने की आहट सुनी तो पीछे पलट कर बोली, इधर आ जाओ, वह युवती मौन संवादों के बीच वहां आकर बैठ गई। दोनों की नजरें मिलीं और दर्द की टीस दोनों के दिमाग में घूम गई। यह दोनों कुछ समय पहले तक एक दूसरे के विपरीत थी। एक बिल्कुल अलमस्त नाजुक सी तो दूसरी एकदम होशियार और जिम्मेदार। एक हर जिम्मेदारी को बखूबी निभाती तो दूसरी छोटे से छोटे काम को भी अंजाम न दे पाती। बेशक…! वो सगी बहने थीं।

किस्मत ने उनकी शादी भी एक ही घर में दो भाइयों से हो गई। बड़ी बहन शैली थी वह देवरानी बन गई और जो छोटी बहन कैरी वो जेठानी। जेठानी बनी छोटी बहन हर समय बड़ी बहन को जताने की कोशिश करती कि तुम भले ही हर काम में मुझासे बेहतर हो तो क्या हुआ, मैं तुमसे ओहदे में बड़ी हूं। बचपन की ये तकरार शादी होने पर दुश्मनी में बदल गई। लेकिन विधाता ने दोनों की किस्मत शायद एक ही कलम की स्याही से लिखी थी। बड़ा भाई यानी कैरी का पति अमरीका में डॉक्टर और छोटा भाई शैली का पति शिप पर काम करता, जिससे अक्सर कई-कई महीने बाहर रहता था।

इसी दौरान कोरोना नामक महामारी ने पैर पसार लिए। एक दिन अचानक लॉकडाउन की घोषणा हो गई। दूसरी वाली बहन अमरीका से भारत आई हुई थी। लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में वो अपने पतियों के संपर्क में थी। फिर अचानक दोनों का पतियों से संपर्क नहीं हुआ। एक दिन अमरीका से फोन आया कि कैरी के पति ड्यूटी के दौरान इलाज करते हुए कोरोना से संक्रमित हो गुजर गए। कैरी को सूचना मिली, तो अलमस्त रहने वाली लड़की एकदम चुप हो गई। वह हर समय रोती रहती। उसकी बड़ी बहन शैली चाहती कि वह हालात से समझाौता करें, यूं हर वक्त रोते रहने की बजाय उनका डटकर मुकाबला करें। इसी बीच दूसरी बहन के पति के बारे में सूचना आई कि उनके शिप को समुद्री लुटेरों ने लूट लिया और खून खराबे के चलते सभी चौदह कर्मचारियों की मौत हो गई।

तालाब की सीढिय़ों पर बैठी ये दो जवान सुंदर युवतियां जो हमेशा एक दूसरे के विरुद्ध खड़ी रहीं, आज अपने अपने दुख में एक दूसरे को हिम्मत बंधा रही थीं। इस हादसे की खबर चारों तरफ शहर में फैल गई। बहुत सारे जानने वाले रिश्तेदार मिनट मिनट पर फोन करते और कहते- क्या करें हम तो मातमपुर्सी करने आना चाहते हैं। लेकिन हम लाचार हैं, इस कोरोना काल में हम आ नहीं सकते। सारे नाते रिश्तेदार फोन पर ही सारी हमदर्दी जता देना चाहते थे। दोनों बहनें अपने पतियों को याद करते हुए अकेले रहना चाहती थीं। पतियों की मौत के बाद से वह एक दूसरे की जड़ों के जुड़ाव को महसूस कर रही थीं। उन्होंने एक-दूसरे के मन को समझा और घंटों रो लेने के बाद जो शांत और जिम्मेदार बहन थी बोली, चलो घर चलते हैं, तुमने कल रात से कुछ नहीं खाया है।
नहीं मुझो घर नहीं जाना, वहां फोन की घंटी चैन से रोने भी नहीं देती है ।



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